Sunday, 28 December 2014

रात तो ढलती है पर सवेरा नहीं होता 


निंदिया तो आ जाती है पर सवेरा नहीं होता 
वो हर अश्क मेरा होकर भी मेरा नहीं होता 
कट जाता है वक़्त इसी सोच में 
उठा  लें ग़म तेरे अपने आगोश में 
पर मेरा हाथ क्यों तेरा नहीं होता 
रात तो ढलती है पर… ?

क्यों तेरे मासूम चेहरे पर सवालों के घेरें हैं 
क्यों तेरी आँखों में  राज़ घनेरे हैं 
जवाबों का दामन भर तो लेती हूँ 
पर मेरा जवाब क्यों तेरा नहीं  होता 
रात तो ढलती है पर........ ?

राहों में  खोया सा तु है ,
है किस मंजिल की तलाश तुझे ?
हम थाम  तो ले तुझे पर  
क्यों नहीं है विश्वास  तुझे 
 होते हैं रोज़ तेरी राहों से मुख्तसर 
पर क्यों मेरा साथ तेरा नही होता 
रात तो ढलती है पर…। ?





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