Sunday, 28 December 2014

रात तो ढलती है पर सवेरा नहीं होता 


निंदिया तो आ जाती है पर सवेरा नहीं होता 
वो हर अश्क मेरा होकर भी मेरा नहीं होता 
कट जाता है वक़्त इसी सोच में 
उठा  लें ग़म तेरे अपने आगोश में 
पर मेरा हाथ क्यों तेरा नहीं होता 
रात तो ढलती है पर… ?

क्यों तेरे मासूम चेहरे पर सवालों के घेरें हैं 
क्यों तेरी आँखों में  राज़ घनेरे हैं 
जवाबों का दामन भर तो लेती हूँ 
पर मेरा जवाब क्यों तेरा नहीं  होता 
रात तो ढलती है पर........ ?

राहों में  खोया सा तु है ,
है किस मंजिल की तलाश तुझे ?
हम थाम  तो ले तुझे पर  
क्यों नहीं है विश्वास  तुझे 
 होते हैं रोज़ तेरी राहों से मुख्तसर 
पर क्यों मेरा साथ तेरा नही होता 
रात तो ढलती है पर…। ?





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Thursday, 25 December 2014

 खो गयी  देशभक्ति आधा हुआ हिंदुस्तान, 
 खुद के बारे में सोचते रह गए  ये नेता महान।  

 जिनकी  रगों  में हिन्दुस्तानी खूं की लहर बहती थी  
 उनकी ख़ातिर नयनों में लेशमात्र प्रेम बाकि नहीं है 

 साक्षी हैं सूनी गोदें उन बिलखती माताओँ की 
 जिनके अश्क़ विरक्त आँखें करुण गाथा की गवाही दे रही 

 हुआ खून उस त्याग का जिसने रचा देश का स्वर्णिम इतिहास 
 पर नहीं है आज  नेताओं को उस बलिदान का एहसास 
 नेहरू गांधी का नाम तो लिया 
 पर हिम पर्वत पर गिरे रक्त को  भुला दिया

 सुभाष ,पटेल,शास्त्री जी की जयंती का कोई नामोनिशान नहीं   है। 
 क्यों इनकी भूमिका पर कहीं कोई ध्यान नहीं है। 

 मानेक जैसे वीरों का   ध्यान ना  ये कर  पाये।
 जिनके बल पर  आज तलाक ये जीतते आये 

 राष्ट्रपति ,प्रधानमंत्री जी को भी याद  होगा
 मानेक जैसे वीरों का सम्मान उन्हें करना होगा। 

Shruri...




Tuesday, 23 December 2014

             बैर 

मेरा मुझसे बैर हो गया ,
हर लम्हा अब गैर हो गया।  
दूजों पर क्या व्यंग्य करुँ मैं ,
खुद का दिल ही ज़हर हो गया। 
मेघ बरसता सावन आता ,
अब तो वो भी कहर हो गया।  
कल तक था मैं  शांत सुबह सा ,
 अब तपती  दोपहर हो गया। 
सदियों से  गाँवों सा उज्जवल, 
अब तो मैं भी शहर  हो गया। 
मैं भी था हिन्दुस्तां कभी ,
था सोने की ख़ान  कभी। 
जाने कहाँ  मेरा वजूद खो गया ,
अब तो  मैं भी  इंडिया  हो गया। 
  किनारें 


डूबती कश्ती थी या, बहते किनारे थे। 
हर मोड़ पर मुड़ते ,ख्वाबों के दायरे थे। 
भीड़ में दुनियाँ की खोकर, क्यों  जीना था। 
हर पल चले उस राह पर, जिस पर अँगारें थे।  
तूफां की भी तो ,अपनी ही  कहानी थी। 
तूफां में कश्ती के , हम तो  दीवाने थे। 
एक पल के जीवन को, ख्वाबों  में जीना था। 
सही-ओ-गलत न हमारे मायने थे। 
पर  अभी तक  हैं हाथों में, टुकड़े ही ख्वाबों  के। 
ना उतार सकते हैं कागज़ पर ,हैं वो भी  हज़ारों में। 

rekhayen

रे खा यें 
की चढ़  में लिपटी
         मेरे हाथों की रेखाएँ हैं ! 
हर ओर देख लिया मैंने
         मेरे सपनोँ की सीमाएँ हैं !
 मेरी कश्ती तूफानों का 
        अंत ना कर पायी तो क्या?
  इस दिल में अब भी !!!
        तूफां से टकराने की इच्छाएँ हैं. 
मेरे  पाँवों में बेड़ियां ड़ाल 
        तू क्यों इतना इतराता  है। 
टूट कर बिखेरेंगी ये भी 
         इतनी प्रबल मेरी इच्छायें हैं।