घरोंदा
पिता की आभा से
पति कि शोभा का सफर अधुरा है
मेरे वात्सल्य का वो का
वो मोड़ अभी धुंधला सा है
की जिसकी मौज़दूगी से
ठहर जाती जिंदगी
अक्स होता वो
मेरी आखरी तमन्ना का
की जिसकी तुतलाती बोली में
भूल जाते हर दर्द
की जिसके बाद होता
यक़ीन मेरा वज़ूद पूरा है
पर पिता की दहलीज़ से
पिया के आँगन का सावन
हुआ यों घायल समर्पण
लौटी यूं अधूरी दुल्हन
की टूटा अब मेरा घरोंदा है
पिता की आभा से
पति कि शोभा का सफर अधुरा है
मेरे वात्सल्य का वो का
वो मोड़ अभी धुंधला सा है
की जिसकी मौज़दूगी से
ठहर जाती जिंदगी
अक्स होता वो
मेरी आखरी तमन्ना का
की जिसकी तुतलाती बोली में
भूल जाते हर दर्द
की जिसके बाद होता
यक़ीन मेरा वज़ूद पूरा है
पर पिता की दहलीज़ से
पिया के आँगन का सावन
हुआ यों घायल समर्पण
लौटी यूं अधूरी दुल्हन
की टूटा अब मेरा घरोंदा है
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