किनारें
हर मोड़ पर मुड़ते ,ख्वाबों के दायरे थे।
भीड़ में दुनियाँ की खोकर, क्यों जीना था।
हर पल चले उस राह पर, जिस पर अँगारें थे।
तूफां की भी तो ,अपनी ही कहानी थी।
तूफां में कश्ती के , हम तो दीवाने थे।
एक पल के जीवन को, ख्वाबों में जीना था।
सही-ओ-गलत न हमारे मायने थे।
पर अभी तक हैं हाथों में, टुकड़े ही ख्वाबों के।
ना उतार सकते हैं कागज़ पर ,हैं वो भी हज़ारों में।
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