बैर
मेरा मुझसे बैर हो गया ,
हर लम्हा अब गैर हो गया।
दूजों पर क्या व्यंग्य करुँ मैं ,
खुद का दिल ही ज़हर हो गया।
मेघ बरसता सावन आता ,
अब तो वो भी कहर हो गया।
कल तक था मैं शांत सुबह सा ,
अब तपती दोपहर हो गया।
सदियों से गाँवों सा उज्जवल,
अब तो मैं भी शहर हो गया।
मैं भी था हिन्दुस्तां कभी ,
था सोने की ख़ान कभी।
जाने कहाँ मेरा वजूद खो गया ,
अब तो मैं भी इंडिया हो गया।
मेरा मुझसे बैर हो गया ,
हर लम्हा अब गैर हो गया।
दूजों पर क्या व्यंग्य करुँ मैं ,
खुद का दिल ही ज़हर हो गया।
मेघ बरसता सावन आता ,
अब तो वो भी कहर हो गया।
कल तक था मैं शांत सुबह सा ,
अब तपती दोपहर हो गया।
सदियों से गाँवों सा उज्जवल,
अब तो मैं भी शहर हो गया।
मैं भी था हिन्दुस्तां कभी ,
था सोने की ख़ान कभी।
जाने कहाँ मेरा वजूद खो गया ,
अब तो मैं भी इंडिया हो गया।
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