Tuesday, 23 December 2014

             बैर 

मेरा मुझसे बैर हो गया ,
हर लम्हा अब गैर हो गया।  
दूजों पर क्या व्यंग्य करुँ मैं ,
खुद का दिल ही ज़हर हो गया। 
मेघ बरसता सावन आता ,
अब तो वो भी कहर हो गया।  
कल तक था मैं  शांत सुबह सा ,
 अब तपती  दोपहर हो गया। 
सदियों से  गाँवों सा उज्जवल, 
अब तो मैं भी शहर  हो गया। 
मैं भी था हिन्दुस्तां कभी ,
था सोने की ख़ान  कभी। 
जाने कहाँ  मेरा वजूद खो गया ,
अब तो  मैं भी  इंडिया  हो गया। 

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