रे खा यें
की चढ़ में लिपटी
मेरे हाथों की रेखाएँ हैं !
हर ओर देख लिया मैंने
मेरे सपनोँ की सीमाएँ हैं !
मेरी कश्ती तूफानों का
अंत ना कर पायी तो क्या?
इस दिल में अब भी !!!
तूफां से टकराने की इच्छाएँ हैं.
मेरे पाँवों में बेड़ियां ड़ाल
तू क्यों इतना इतराता है।
टूट कर बिखेरेंगी ये भी
इतनी प्रबल मेरी इच्छायें हैं।
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