Sunday, 10 January 2016

 १२ दिन का मोल 
बिक गए आंसूं अपनों के खड़ा जमाना  देख रहा 
 हां वो मेरा अपना था जो आंसू को भी बेच गया 
वो १२ दिन के हर पल की कीमत चंद कागज़  में ढूंढ गया 
दिखाकर आंसू हर लम्हे को लूट गया 
मृत्यु शैय्या पर लेटे हुए के घर का ये मान रखा 
बिन कटोरे भीख मांग ली उसके  बच्चो के नाम पर 
टूटती हुई ममता नही न रोटी हुई किलकारी देखी 
उसने अपने स्वार्थ में बस नोटों की यारी देखी देखिी
ताउजी का स्नेह नहीं वो ढोंग और आडम्बर है 
चाचा से उम्मीद नहीं बिक गया इनका अम्बर है 
सर पर रखा हाथ नहीं ये कफ़न की  तैयारी है 
 अपनों की दुनिया बस १२ दिन के फरेब की मारी है 

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